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चुनौती देने वाली याचिका को खारिज किया जाए

चुनौती देने वाली याचिका को खारिज किया जाए

नगर निगम चंडीगढ़ में नॉमिनेटेड पार्षद के मताधिकार मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पार्षदों के नॉमिनेशन को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि नॉमिनेेटिड काउंसलर का प्रावधान निगम में राजनीतिक पार्टियों के लोगों की बैकडोर एंट्री जैसा है।
सोमवार को याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणियों के साथ ही पार्षदों को नॉमिनेटिड करने पर हाईकोर्ट ने सवाल उठा दिया। इस पर प्रतिवादी पक्ष के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि संसद में एमपी को नॉमिनेटिड किया जाता हैं। इस पर बेंच ने कहा कि वह संवैधानिक प्रावधान के तहत होता है, जबकि चंडीगढ़ में न तो कोई विधायिका है और न ही कोई ऐसा कोई संवैधानिक प्रावधान। प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि अनुच्छेद 249 जेडबी के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह नॉमिनेटिड पार्षद को मताधिकार का अधिकार दे सकता है। चंडीगढ़ के मामले में राष्ट्रपति ने ऐसा ही किया है।

इस पर बेंच ने सवाल करते हुए कहा कि ऐसे विशेषाधिकार का प्रयोग कर क्यों न हाईकोर्ट बंद कर दिया जाए। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पार्षद नॉमिनेटिड करना व उनको मताधिकार देना कानूनन सही नही हैं। बहस के दौरान प्रतिवादी पक्ष ने संविधान पर अपना पक्ष रखा। प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि अनुच्छेद के तहत चाहे नामित पार्षदों को मताधिकार हासिल नहीं है, लेकिन अनुच्छेद अनुच्छेद 249 जेडबी के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह प्रावधान से केंद्र शासित प्रदेश को छूट दे सकते हैं। इसी अधिकार का इस्तेमाल कर चंडीगढ़ को इस मामले में छूट दी गई है। चंडीगढ़ प्रशासन ने हाईकोर्ट में पक्ष रखते हुए साफ कर दिया है कि चंडीगढ़ के नॉमिनेटिड पार्षदों को मताधिकार का अधिकार कानूनन सही है। ऐसे में इसको चुनौती देने वाली याचिका को खारिज किया जाए। इस मामले पर अब बुधवार को सुनवाई होगी।

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